एक सत्संग के दौरान एक महिला भक्त ने प्रश्न किया कि वह भगवान शिव की भक्त हैं। चूंकि भगवान शिव वैराग्य और त्याग के प्रतीक माने जाते हैं, ऐसे में अगर वह अच्छा घर, गाड़ी या आर्थिक समृद्धि की इच्छा करती हैं तो क्या यह गलत है?
प्रेमानंद महाराज ने समझाया कि भक्ति का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि संतुलन रखना है। उन्होंने कहा—
भगवान की भक्ति करते हुए यदि कोई अपने परिवार के लिए सुख-सुविधा चाहता है, तो यह स्वाभाविक है।
धन, घर या गाड़ी की इच्छा करना अपने आप में गलत नहीं है, गलत तब है जब लालच और अहंकार हावी हो जाए।
भगवान शिव स्वयं त्यागी हैं, लेकिन वे भक्तों को जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन और सद्बुद्धि देते हैं।
महाराज ने समझाया कि वैराग्य का मतलब यह नहीं कि इंसान जिम्मेदारियों से दूर भागे। असली वैराग्य है—
यदि आपकी इच्छाएं परिश्रम, ईमानदारी और धर्म के मार्ग पर आधारित हैं, तो वे गलत नहीं हैं। भक्ति का उद्देश्य जीवन से भागना नहीं, बल्कि उसे सही दिशा देना है।
अर्थात, भगवान शिव के भक्त होकर भी आप समृद्धि की कामना कर सकते हैं—बस भाव शुद्ध और नीयत साफ होनी चाहिए।
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