Saturday, 31 January 2026

आयुर्वेदिक औषधियों में सबसे ज्यादा छेड़छाड़ च्यवनप्राश के साथ, मूल स्वरूप से दूर होता जा रहा है बाजारू उत्पाद



नई दिल्ली: आयुर्वेद में च्यवनप्राश को एक संपूर्ण रसायन औषधि माना गया है, जिसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथ चरक संहिता में मिलता है। खासकर सर्दियों के मौसम में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए इसका सेवन सदियों से किया जाता रहा है। लेकिन समय के साथ बाजार में मिलने वाले च्यवनप्राश के स्वरूप में व्यापक बदलाव और छेड़छाड़ देखने को मिल रही है।

आयुर्वेदाचार्यों का कहना है कि आज बाजार में उपलब्ध अधिकांश च्यवनप्राश अपने मूल आयुर्वेदिक स्वरूप से काफी दूर हो चुके हैं। पारंपरिक च्यवनप्राश में आंवला, दशमूल, अश्वगंधा, पिप्पली, शतावरी, गिलोय समेत दर्जनों जड़ी-बूटियों का संतुलित मिश्रण होता है। वहीं आजकल के उत्पादों में स्वाद और मार्केटिंग के लिए चीनी, फ्लेवर और प्रिज़र्वेटिव्स की मात्रा बढ़ा दी गई है।

विशेषज्ञों के अनुसार, आयुर्वेदिक औषधियों में सबसे ज्यादा प्रयोग और बदलाव च्यवनप्राश के साथ ही हुआ है। इसके कारण इसके औषधीय गुणों पर भी असर पड़ता है। कई बार लोग यह समझ ही नहीं पाते कि वे जिस च्यवनप्राश का सेवन कर रहे हैं, वह आयुर्वेदिक है या सिर्फ एक हेल्थ सप्लीमेंट।

आयुर्वेदाचार्य सलाह देते हैं कि यदि संभव हो तो चरक संहिता में वर्णित विधि के अनुसार घर पर च्यवनप्राश बनाना सबसे बेहतर विकल्प है। घर पर बनाया गया च्यवनप्राश न केवल शुद्ध होता है, बल्कि शरीर को शक्ति, ऊर्जा और रोगों से लड़ने की क्षमता भी प्रदान करता है।

 

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